नई दिल्ली (ऑटोमोबाइल डेस्क): यदि आपके पास कोई पुरानी 10 या 15 साल पुरानी पेट्रोल या डीजल कार है जिसे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) या स्क्रैपेज पॉलिसी के तहत कबाड़ घोषित किए जाने का डर सता रहा है, तो आपके लिए केंद्र सरकार और सड़क परिवहन मंत्रालय की ओर से बहुत बड़ी राहत भरी खबर सामने आई है। भारी उद्योग मंत्रालय और नीति आयोग ने देश में ईवी रेट्रोफिटमेंट पॉलिसी (EV Retrofitment Policy 2026) के नए और सरलीकृत दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप दे दिया है। इस नई नीति के तहत अब देश के टियर-2 और टियर-3 शहरों के स्थानीय गैरेज और अनुभवी ऑटो मैकेनिक्स को सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त ‘सर्टिफाइड ईवी रेट्रोफिटर’ बनाया जाएगा। इसका मतलब यह है कि अब आप अपनी पसंदीदा पुरानी मारुति, हुंडई, होंडा या टाटा की कार को कबाड़ में बेचने के बजाय बेहद कम लागत में एक पूरी तरह कानूनी और प्रमाणित इलेक्ट्रिक कार में बदल सकेंगे।
ईवी रेट्रोफिटमेंट क्या है और यह नई कार खरीदने से बेहतर क्यों है?
ईवी रेट्रोफिटमेंट एक ऐसी ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग प्रक्रिया है, जिसमें किसी पुरानी पेट्रोल या डीजल गाड़ी के इंजन, फ्यूल टैंक, साइलेंसर और एग्जॉस्ट सिस्टम को हटाकर उसकी जगह एक इलेक्ट्रिक मोटर, बैटरी पैक, कंट्रोलर और ऑन-बोर्ड चार्जर फिट कर दिया जाता है। गाड़ी का चेसिस, सस्पेंशन, बॉडी और इंटीरियर वही पुराना रहता है, लेकिन गाड़ी पूरी तरह से जीरो-एमिशन इलेक्ट्रिक व्हीकल बन जाती है।
आज के समय में भारतीय बाजार में एक नई इलेक्ट्रिक कार (जैसे टाटा टियागो ईवी या एमजी कॉमेट) खरीदने के लिए कम से कम 8 से 12 लाख रुपये खर्च करने पड़ते हैं। वहीं दूसरी तरफ, यदि आप अपनी मौजूदा कार को रेट्रोफिट कराते हैं, तो यह काम मात्र 2.5 से 4 लाख रुपये के बजट में पूरा हो जाता है। इससे न केवल मध्यमवर्गीय परिवारों के लाखों रुपये बचते हैं, बल्कि देश में लाखों टन ऑटोमोबाइल कचरा पैदा होने से भी रुकता है। दिल्ली-एनसीआर जैसे शहरों में जहां 10 साल पुरानी डीजल और 15 साल पुरानी पेट्रोल कारों पर प्रतिबंध है, वहां रेट्रोफिटमेंट कराने के बाद गाड़ी को अगले 5 से 10 साल तक चलाने का नया आरटीओ फिटनेस सर्टिफिकेट मिल जाता है।

लोकल मैकेनिक्स को स्किल ट्रेनिंग और सरकारी प्रमाणन
इस नई नीति की सबसे क्रांतिकारी बात यह है कि सरकार इसे केवल बड़े ऑटोमोबाइल कॉरपोरेट्स तक सीमित नहीं रखना चाहती। स्किल इंडिया मिशन और ऑटोमोटिव स्किल्स डेवलपमेंट काउंसिल (ASDC) के सहयोग से देश भर के आईटीआई (ITI) और पॉलिटेक्निक संस्थानों में स्थानीय कार मैकेनिक्स के लिए 45 दिनों का विशेष ‘ईवी कन्वर्जन एंड सेफ्टी कोर्स’ शुरू किया जा रहा है।
जो मैकेनिक पिछले 10-15 सालों से पेट्रोल-डीजल कारों के इंजन रिपेयर कर रहे हैं, उन्हें हाई-वोल्टेज बैटरी वायरिंग, बीएमएस (बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम) कैलिब्रेशन, मोटर इंस्टॉलेशन और थर्मल सुरक्षा का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। कोर्स पूरा करने के बाद इन मैकेनिक्स को आधिकारिक सरकारी सर्टिफिकेट मिलेगा और उनका गैरेज ‘ऑथराइज्ड ईवी रेट्रोफिट सेंटर’ के रूप में पंजीकृत हो जाएगा। इससे ग्रामीण और छोटे कस्बों में स्वरोजगार के लाखों नए अवसर पैदा होंगे और गाड़ी मालिकों को किसी बड़े शहर के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।
कितना आएगा कुल खर्च और कितनी मिलेगी ड्राइविंग रेंज?
रेट्रोफिटमेंट का खर्च इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपनी कार में कितनी बड़ी बैटरी लगवाना चाहते हैं और आपको रोजाना कितने किलोमीटर चलना होता है:
1. बेसिक सिटी कम्यूट पैक (12 से 15 kWh बैटरी): यदि आप गाड़ी को केवल रोजाना ऑफिस आने-जाने और शहर के 40-50 किलोमीटर के दायरे में चलाना चाहते हैं, तो 12 kWh का एलएफपी (LFP) बैटरी पैक सबसे उपयुक्त है। यह सिंगल चार्ज पर 100 से 120 किलोमीटर की वास्तविक रेंज देता है। इसका कुल कन्वर्जन खर्च लगभग ₹2.25 लाख से ₹2.75 लाख के बीच आता है।
2. लॉन्ग-रेंज पैक (20 से 25 kWh बैटरी): यदि आप कभी-कभार हाईवे पर भी निकलते हैं, तो 20 kWh का बड़ा बैटरी पैक 180 से 220 किलोमीटर की रेंज प्रदान करता है। इस किट की कुल लागत लगभग ₹3.50 लाख से ₹4.20 लाख तक बैठती है।
ईंधन की बचत के हिसाब से देखें तो पेट्रोल कार में जहां प्रति किलोमीटर चलने का खर्च लगभग 7 से 9 रुपये आता है, वहीं रेट्रोफिटेड इलेक्ट्रिक कार में घर पर चार्ज करने पर यह खर्च घटकर मात्र 1 से 1.20 रुपये प्रति किलोमीटर रह जाता है। यानी यदि आप रोजाना 40 किलोमीटर चलते हैं, तो साल भर में आप पेट्रोल पर लगभग 1 लाख रुपये बचा लेंगे और 3 साल में आपकी पूरी किट की लागत वसूल हो जाएगी।
RTO अप्रूवल और ग्रीन नंबर प्लेट लेने की पूरी प्रक्रिया
सरकार ने इस बात का सख्त नियम बनाया है कि सड़क पर चलने वाली हर रेट्रोफिटेड कार सुरक्षित और कानूनी हो। इसके लिए निम्नलिखित आसान प्रक्रिया निर्धारित की गई है:
1. केवल एआरएआई (ARAI) या आईसीएटी (ICAT) से अप्रूव्ड किट ही लगाएं: बाजार में कई अनधिकृत चीनी किट मिलती हैं, जिनसे बचना जरूरी है। हमेशा प्रमाणित रेट्रोफिटिंग सेंटर से ही किट लगवाएं जो आपको किट का टाइप-अप्रूवल सर्टिफिकेट दे।
2. इंस्टॉलेशन इनवॉइस और सेफ्टी सर्टिफिकेट: रेट्रोफिटिंग पूरी होने के बाद मैकेनिक आपको इंस्टॉलेशन बिल, मोटर नंबर, बैटरी पैक का सीरियल नंबर और लोड-टेस्ट रिपोर्ट सौंपेगा।
3. परिवहन सेवा पोर्टल पर आवेदन: इसके बाद आपको सारथी/वाहन पोर्टल (vahan.parivahan.gov.in) पर जाकर ‘Alteration of Motor Vehicle’ विकल्प चुनना होगा और ऑनलाइन फॉर्म भरकर फीस जमा करनी होगी।
4. आरटीओ में फिजिकल फिटनेस टेस्ट: निर्धारित तारीख पर गाड़ी को स्थानीय आरटीओ ले जाकर मोटर व्हीकल इंस्पेक्टर (MVI) से जांच करानी होगी। इंस्पेक्टर यह सुनिश्चित करेगा कि ब्रेक, हेडलाइट, इंडिकेटर और चेसिस बिल्कुल सही स्थिति में हैं।
5. आरसी में ईंधन बदलाव और ग्रीन प्लेट: फिटनेस पास होते ही आपकी पुरानी आरसी (Registration Certificate) में फ्यूल टाइप ‘Petrol/Diesel’ से बदलकर ‘Electric’ दर्ज हो जाएगा और आपकी कार पर आधिकारिक हरी नंबर प्लेट (Green Number Plate) जारी कर दी जाएगी।
सुरक्षा मानक और वारंटी का भरोसा
कई लोगों के मन में यह डर रहता है कि क्या पुरानी कार में बैटरी लगाना सुरक्षित है? नई गाइडलाइन्स में स्पष्ट किया गया है कि सभी रेट्रोफिट किट्स को AIS-156 और IP67 मानकों का पालन करना अनिवार्य है। इसका मतलब है कि बैटरी पूरी तरह से वाटरप्रूफ और डस्टप्रूफ होती है। अत्यधिक गर्मी में बैटरी को फटने से बचाने के लिए ऑटोमैटिक थर्मल कट-ऑफ और स्मार्ट कूलिंग सिस्टम दिया जाता है। प्रमाणित कंपनियां बैटरी पैक पर 3 से 5 साल की वारंटी और 1,500 से अधिक चार्जिंग साइकिल की गारंटी देती हैं।
भारत सरकार की यह दूरदर्शी नीति न केवल पुरानी गाड़ियों के मालिकों को कबाड़ स्क्रैप के नुकसान से बचाएगी, बल्कि देश के प्रदूषण स्तर को कम करने और स्थानीय रोजगार को बढ़ाने में भी क्रांतिकारी भूमिका निभाएगी। ऑटोमोबाइल तकनीकी सुधारों और इलेक्ट्रिक वाहनों की ताज़ा खबरों के लिए हमारे ऑटोमोबाइल पोर्टल को नियमित रूप से फॉलो करते रहें।
किन-किन पुरानी कारों में रेट्रोफिटमेंट सबसे आसान और किफायती है?
भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार में कुछ ऐसी कारें हैं जिनका चेसिस और बॉडी डिजाइन इलेक्ट्रिक किट लगाने के लिए सबसे मुफीद साबित हुआ है। इनमें मारुति सुजुकी की वैगनआर (WagonR), ऑल्टो (Alto 800/K10), स्विफ्ट (Swift), और डिजायर सबसे आगे हैं। इन कारों का इंजन-बे काफी खुला होता है जहां इलेक्ट्रिक मोटर और वायरिंग आसानी से फिट हो जाती है। इसके अलावा हुंडई सैंट्रो, आई10, और टाटा टियागो के पुराने मॉडल्स में भी रेट्रोफिटिंग बहुत सफल रही है।
यदि आप एक सेडान या कॉम्पैक्ट एसयूवी जैसे होंडा सिटी या मारुति विटारा ब्रेज़ा को रेट्रोफिट कराना चाहते हैं, तो इनके भारी वजन को संभालने के लिए 25 से 30 kWh की बड़ी बैटरी और ज्यादा टॉर्क वाली पीएमएसएम (PMSM) मोटर की जरूरत पड़ती है। सर्टिफाइड मैकेनिक्स पहले गाड़ी के पुराने गियरबॉक्स का निरीक्षण करते हैं; यदि गियरबॉक्स अच्छी स्थिति में है तो उसे इलेक्ट्रिक मोटर के साथ री-ट्यून कर दिया जाता है, जिससे गाड़ी को रिवर्स और ड्राइव मोड में चलाना बेहद आसान हो जाता है।
बैटरी चार्जिंग विकल्प: सामान्य घरेलू 15A सॉकेट से कैसे चार्ज करें?
रेट्रोफिटेड कार का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इसके लिए किसी महंगे कमर्शियल चार्जिंग स्टेशन की आवश्यकता नहीं होती। किट के साथ एक 3.3 kW का स्मार्ट पोर्टेबल चार्जर दिया जाता है जिसे आप अपने घर के किसी भी सामान्य 15 एम्पीयर के थ्री-पिन सॉकेट (जिसमें गीजर या एसी चलता है) में प्लग कर सकते हैं। रात में गाड़ी को चार्ज पर लगाने पर यह 4 से 5 घंटे में 0 से 100% फुल चार्ज हो जाती है। इसके चार्जर में ऑटोमैटिक कट-ऑफ और वोल्टेज प्रोटेक्शन होता है ताकि रात भर चार्जिंग पर लगे रहने से बैटरी ओवरचार्ज न हो।
