नई दिल्ली (ऑटोमोबाइल व ऊर्जा डेस्क): भारत को इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक विनिर्माण महाशक्ति बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक युगांतरकारी कदम उठाया है। प्रधानमंत्री के ‘नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन’ (National Critical Mineral Mission) के तहत देश भर में 12 अत्याधुनिक मेगा लिथियम-आयन बैटरी रीसाइक्लिंग और रिफाइनिंग यूनिट्स को आधिकारिक मंजूरी मिलने के बाद पहली वाणिज्यिक रिसाइकलिंग सुविधा ने अपना उत्पादन शुरू कर दिया है। यह कदम भारत की चीन और अन्य विदेशी देशों पर लिथियम, कोबाल्ट, और निकल के आयात की 90% से अधिक निर्भरता को समाप्त करने में मील का पत्थर साबित होगा। ऑटोमोबाइल विश्लेषकों का मानना है कि घरेलू स्तर पर रीसाइकिल्ड खनिजों की उपलब्धता से इलेक्ट्रिक कारों और दोपहिया वाहनों की बैटरी की लागत में 25% से 30% तक की सीधी गिरावट आएगी, जिससे भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियां पेट्रोल गाड़ियों जितनी सस्ती हो सकेंगी।
क्रिटिकल मिनरल्स क्या हैं और भारत के लिए इनकी क्या अहमियत है?
इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की कुल लागत का लगभग 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा उसकी लिथियम-आयन बैटरी का होता है। इस बैटरी को बनाने के लिए चार प्रमुख दुर्लभ खनिजों—लिथियम, कोबाल्ट, निकल और ग्रेफाइट की आवश्यकता होती है। वर्तमान में पूरी दुनिया में इन खनिजों के खनन और रिफाइनिंग के लगभग 70% बाजार पर चीन का एकाधिकार है। यदि कोई भू-राजनीतिक संकट या आपूर्ति बाधा आती है, तो भारत के ऑटोमोबाइल कारखानों में गाड़ियों का उत्पादन ठप होने का खतरा बना रहता था।
इसी खतरे को भांपते हुए भारत सरकार ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन की शुरुआत की है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य पुराने स्मार्टफोन, लैपटॉप, टू-व्हीलर्स और इलेक्ट्रिक बसों से निकलने वाली एक्सपायर्ड बैटरियों को कचरा बनने से रोकना और उन्हें साइंटिफिक रीसाइक्लिंग के जरिए दोबारा उच्च-शुद्धता वाले ‘बैटरी-ग्रेड’ लिथियम और कोबाल्ट में बदलना है। इसे ऑटोमोबाइल की भाषा में ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ (Circular Economy) कहा जाता है।

ब्लैक मास और 99.5% शुद्धता: कैसे काम करती है रीसाइक्लिंग तकनीक?
नई मेगा रीसाइक्लिंग यूनिट में अपनाई गई तकनीक पर्यावरण के अनुकूल ‘हाइड्रो-मेटालर्जिकल’ (Hydrometallurgical) प्रोसेस पर आधारित है:
सबसे पहले पुरानी और मृत बैटरियों को पूरी तरह डिस्चार्ज करके ऑटोमेटेड श्रेडर में बारीक टुकड़ों में तोड़ा जाता है। इससे एक गाढ़ा काला पाउडर तैयार होता है जिसे तकनीकी रूप से ‘ब्लैक मास’ (Black Mass) कहा जाता है। इस ब्लैक मास में लिथियम, निकल, कोबाल्ट और मैंगनीज का समृद्ध मिश्रण मौजूद रहता है।
इसके बाद रासायनिक शोधन और इलेक्ट्रो-विनिंग प्रक्रियाओं के जरिए 99.5% से अधिक शुद्धता वाला लिथियम कार्बोनेट और कोबाल्ट सल्फेट अलग कर लिया जाता है। यह रिसाइकिल किया गया कच्चा माल इतना शुद्ध होता है कि इसे सीधे नई गीगाफैक्ट्रीज (जैसे टाटा, एक्साइड या अमारा राजा) में नई ईवी बैटरियां बनाने के लिए भेजा जा सकता है। इस पूरी प्रक्रिया में शून्य कार्बन उत्सर्जन होता है और 95% पानी को रीसायकल करके दोबारा उपयोग किया जाता है।
गाड़ियों की कीमतें कितनी घटेंगी? आम खरीदारों को क्या फायदा?
भारत में जब बैटरी के प्रमुख कच्चे माल का आयात बंद होगा और वह घरेलू रिसाइकिलिंग प्लांट्स से मिलेगा, तो लॉजिस्टिक्स, कस्टम ड्यूटी और विदेशी मुद्रा विनिमय का खर्च पूरी तरह समाप्त हो जाएगा:
वर्तमान में 1 kWh बैटरी पैक की वैश्विक लागत लगभग 110 से 125 डॉलर बैठती है। घरेलू रिसाइकिलिंग के दम पर यह लागत घटकर 75 से 80 डॉलर प्रति kWh के स्तर पर आने का अनुमान है। इसका सीधा मतलब यह है कि 30 kWh बैटरी वाली एक सामान्य फैमिली इलेक्ट्रिक कार (जैसे टाटा नेक्सन ईवी या महिंद्रा एक्सयूवी 3XO ईवी) की कीमत में लगभग ₹1.5 लाख से ₹2.25 लाख की सीधी कमी आएगी। वहीं इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों (ओला, एथर, टीवीएस) की कीमतें ₹15,000 से ₹25,000 तक कम हो सकेंगी।
फेम-3 (FAME-3) सब्सिडी और ‘बैटरी-एज-ए-सर्विस’ के नए नियम
इस मिशन के साथ ही भारी उद्योग मंत्रालय ने बहुप्रतीक्षित FAME-3 (फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ इलेक्ट्रिक व्हीकल्स) योजना के नए ड्राफ्ट नियमों को भी सार्वजनिक किया है। फेम-3 में सरकार ने दो बड़े बदलाव किए हैं:
1. घरेलू खनिज अनिवार्य शर्त: सब्सिडी केवल उन्हीं इलेक्ट्रिक वाहनों को दी जाएगी जिनमें कम से कम 50% बैटरी सामग्री भारत में रिसाइकिल या विनिर्मित की गई हो।
2. बैटरी-एज-ए-सर्विस (BaaS) को कानूनी मान्यता: अब ग्राहक बिना बैटरी के भी इलेक्ट्रिक कार या स्कूटर खरीद सकेंगे, जिससे गाड़ी की शुरुआती शोरूम कीमत पेट्रोल गाड़ी से भी आधी रह जाएगी। बैटरी को वे किराए (Subscription) पर ले सकेंगे और डिस्चार्ज होने पर बैटरी स्वैपिंग स्टेशन पर जाकर 2 मिनट में फुल चार्ज बैटरी से बदल सकेंगे।
ई-कचरा प्रबंधन और पर्यावरण की सुरक्षा
यदि लिथियम-आयन बैटरियों को खुले में या कचरे के ढेरों में फेंक दिया जाए, तो उनमें मौजूद भारी धातुएं जमीन के भूजल को जहरीला बना देती हैं और आग लगने का गंभीर खतरा पैदा करती हैं। सरकार द्वारा लागू किए गए नए ‘एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (EPR) नियमों के तहत सभी कार कंपनियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया है कि वे अपने ग्राहकों से एक्सपायर्ड बैटरियों को वापस लें और उन्हें अधिकृत रीसाइक्लिंग सेंटरों तक पहुंचाएं। ग्राहकों को अपनी पुरानी बैटरी लौटाने पर एक आकर्षक स्क्रैप मूल्य (Buyback Value) भी प्रदान किया जाएगा।
नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन भारत को जीवाश्म ईंधन के चंगुल से मुक्त करके ऊर्जा के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक छलांग है। देश में स्वच्छ गतिशीलता, ईवी इंफ्रास्ट्रक्चर और ऑटोमोबाइल जगत के आगामी नवाचारों की पूरी पड़ताल के लिए हमारे ऑटोमोबाइल सेक्शन के साथ जुड़े रहें।
वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति और चीन का दबदबा टूटना
पिछले एक दशक में जिस तरह ओपेक (OPEC) देशों का दबदबा कच्चे तेल पर था, उसी तरह इलेक्ट्रिक युग में चीन ने वैश्विक लिथियम सप्लाई चेन पर अपना शिकंजा कस लिया था। दक्षिण अमेरिका के ‘लिथियम ट्राएंगल’ (चिली, अर्जेंटीना, बोलीविया) और ऑस्ट्रेलिया की खदानों से निकलने वाले कच्चे अयस्क की 65% से अधिक रिफाइनिंग चीन में होती है। लेकिन भारत के नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन ने इस समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है।
भारत अब ‘अर्बन माइनिंग’ (Urban Mining) यानी शहरों से निकलने वाले पुराने गैजेट्स और बैटरियों के रिसाइकलिंग मॉडल को अपना रहा है। एक अनुमान के अनुसार, 1 टन पुरानी लिथियम-आयन बैटरियों से जितना शुद्ध लिथियम निकाला जा सकता है, उतना लिथियम निकालने के लिए खदान से 250 टन कच्चा अयस्क खोदना पड़ता है। इसलिए रीसाइक्लिंग न केवल पर्यावरण के लिए वरदान है बल्कि यह खनन के मुकाबले 70% कम ऊर्जा की खपत करती है।
भारतीय कार निर्माताओं की प्रतिक्रिया: टाटा, महिंद्रा और मारुति के बड़े करार
इस नई रीसाइक्लिंग नीति के आने के बाद देश की प्रमुख कार निर्माता कंपनियों ने रीसाइक्लिंग स्टार्टअप्स के साथ दीर्घकालिक समझौते (MoUs) किए हैं। टाटा मोटर्स ने अपनी पैसेंजर इलेक्ट्रिक कारों के लिए ‘क्लोज्ड-लूप’ सप्लाई चेन बनाई है, जिसके तहत टाटा ईवी की पुरानी बैटरियों को रीसायकल करके उसी सामग्री से नई नेक्सन ईवी और कर्व ईवी के बैटरी पैक बनाए जाएंगे।
महिंद्रा एंड महिंद्रा और मारुति सुजुकी भी अपने आगामी इलेक्ट्रिक प्लेटफॉर्म्स के लिए घरेलू स्तर पर रीसायकल किए गए लिथियम और निकल का उपयोग करने की तैयारी में हैं। इससे आने वाले 2 से 3 वर्षों में भारत में बनी इलेक्ट्रिक गाड़ियां वैश्विक बाजारों में निर्यात के लिए बेहद प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध होंगी।
