नई दिल्ली (टेक व कूटनीति डेस्क): 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था में जो स्थान कभी कच्चे तेल का हुआ करता था, आज वही स्थान सिलिकॉन चिप्स यानी सेमीकंडक्टर्स (Semiconductors) का बन चुका है। स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक कारों, लड़ाकू विमानों से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के विशाल सुपरकंप्यूटर तक—हर आधुनिक तकनीक का अस्तित्व इन सूक्ष्म माइक्रोचिप्स पर निर्भर है। इसी रणनीतिक दौड़ में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए केंद्र सरकार ने अपने महत्वाकांक्षी ‘सेमीकॉन इंडिया 2.0’ (Semicon 2.0) मिशन के तहत ₹1,27,500 करोड़ के विशाल बजट आवंटन को नई गति दे दी है। इस मिशन को उस समय सबसे बड़ा वैश्विक संबल मिला जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के बीच नई दिल्ली में हुई उच्च-स्तरीय द्विपक्षीय वार्ताओं में भारत-अमेरिका डीप-टेक और सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला साझेदारी पर ऐतिहासिक अंतिम मुहर लगा दी गई।
भारत-अमेरिका सेमीकंडक्टर साझेदारी: क्या है इस ऐतिहासिक डील में?
भारत और अमेरिका के बीच संपन्न हुए इस महत्वपूर्ण समझौते का मुख्य उद्देश्य वैश्विक चिप आपूर्ति श्रृंखला को किसी एक देश (विशेष रूप से ताइवान और चीन) के संकट से मुक्त करना और एक सुरक्षित, पारदर्शी ‘फ्रेंड-शोरिंग’ (Friend-Shoring) नेटवर्क तैयार करना है। समझौते के तहत निम्नलिखित चार प्रमुख स्तंभों पर काम होगा:
पहला, अमेरिका की प्रमुख चिप डिजाइन कंपनियां (जैसे एनवीडिया, क्वालकॉम, एएमडी और इंटेल) भारत में अपने अत्याधुनिक आरएंडडी (R&D) सेंटर्स का विस्तार करेंगी और भारतीय इंजीनियरों के साथ मिलकर स्वदेशी एआई एक्सेलेरेटर चिप्स डिजाइन करेंगी। दूसरा, अमेरिका भारत के सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग प्लांट्स (फैब्स) के लिए जरूरी उन्नत फोटोलिथोग्राफी मशीनों और विशेष गैसों व केमिकल्स के निर्यात पर सभी तकनीकी प्रतिबंधों को हटाएगा। तीसरा, दोनों देश मिलकर अगली पीढ़ी की ‘गैलियम नाइट्राइड’ (GaN) और ‘सिलिकॉन कार्बाइड’ (SiC) चिप्स पर संयुक्त अनुसंधान करेंगे, जो इलेक्ट्रिक वाहनों और रक्षा उपकरणों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

धोलेरा और साणंद: भारत की पहली कमर्शियल चिप्स कब होंगी तैयार?
केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय द्वारा जारी ताजा प्रगति रिपोर्ट के अनुसार देश भर में अनुमोदित 12 बड़े सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट्स पर निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर जारी है:
गुजरात के धोलेरा में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और ताइवान की दिग्गज कंपनी पीएसएमसी (PSMC) द्वारा स्थापित किया जा रहा भारत का पहला विशाल कमर्शियल सेमीकंडक्टर फैब (Fabrication Plant) अपने पहले चरण के अंतिम दौर में पहुंच चुका है। ₹91,000 करोड़ के निवेश वाले इस प्लांट में 28-नैनोमीटर और 40-नैनोमीटर की लॉजिक चिप्स बनाई जाएंगी, जिनका उपयोग ऑटोमोबाइल, दूरसंचार, पावर ग्रिड और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स में होता है। पहली व्यावसायिक चिप्स 2026 के अंत तक बाजार में आ जाएंगी।
वहीं साणंद में माइक्रोन टेक्नोलॉजी (Micron) का ₹22,500 करोड़ वाला उन्नत असेंबली, टेस्टिंग, मार्किंग और पैकेजिंग (ATMP) प्लांट पहले ही पायलट उत्पादन शुरू कर चुका है। असम के मोरीगांव में टाटा का दूसरा विशाल पैकेजिंग प्लांट पूर्वोत्तर भारत को वैश्विक तकनीकी मानचित्र पर स्थापित कर रहा है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के जेवर और ओडिशा में भी सिलिकॉन कार्बाइड प्लांट्स के निर्माण को हरी झंडी दे दी गई है।
भारत में बनेगी पहली स्वदेशी ‘एआई प्रोसेसर चिप’: प्रोजेक्ट शक्ति और वेगा
सेमीकॉन 2.0 का सबसे गौरवशाली पहलू केवल विदेशी चिप्स की पैकेजिंग करना नहीं है, बल्कि भारत में स्वदेशी रूप से डिजाइन किए गए माइक्रोप्रोसेसर्स का निर्माण करना है। आईआईटी मद्रास के ‘शक्ति’ (Shakti) और सी-डैक (C-DAC) के ‘वेगा’ (VEGA) माइक्रोप्रोसेसर प्रोजेक्ट्स अब प्रयोगशालाओं से निकलकर व्यावसायिक उत्पादन के लिए तैयार हैं।
इसके साथ ही भारतीय एआई स्टार्टअप्स ने ओपन-सोर्स ‘RISC-V’ आर्किटेक्चर पर आधारित भारत का पहला स्वदेशी एआई न्यूरल प्रोसेसिंग यूनिट (NPU) तैयार किया है। यह चिप स्मार्ट सिक्योरिटी कैमरों, ऑटोमैटिक कारों और स्मार्ट मीटरों में इंटरनेट के बिना भी सेकंड के हजारवें हिस्से में फेशियल रिकॉग्निशन और ऑब्जेक्ट डिटेक्शन करने में सक्षम है। जब ये चिप्स घरेलू फैब्स में बड़े पैमाने पर बनेंगी, तो भारत को किसी भी विदेशी कंपनी के सामने चिप्स के लिए हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।
रोजगार क्रांति और इंजीनियरिंग छात्रों के लिए स्वर्णिम अवसर
सेमीकंडक्टर उद्योग केवल पूंजी-प्रधान नहीं है, बल्कि यह उच्च-कुशल नौकरियों का सबसे बड़ा जनक भी है। नीति आयोग के अनुमान के अनुसार सेमीकॉन 2.0 मिशन के तहत देश में 1,50,000 से अधिक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष हाई-टेक रोजगार सृजित होंगे। इनमें वीएलएसआई (VLSI) डिजाइन इंजीनियर्स, क्लीनरूम ऑपरेटर्स, मैटेरियल साइंटिस्ट्स और एआई सिस्टम आर्किटेक्ट्स की भारी मांग रहेगी।
सरकार ने इस मांग को पूरा करने के लिए देश के 100 से अधिक शीर्ष इंजीनियरिंग कॉलेजों में ‘चिप्स टू स्टार्टअप’ (C2S) कार्यक्रम शुरू किया है, जहां छात्रों को दुनिया के सबसे महंगे इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (EDA) सॉफ्टवेयर टूल्स मुफ्त उपलब्ध कराए जा रहे हैं। नवनियुक्त सेमीकंडक्टर इंजीनियर्स को शुरुआती दौर में ही ₹12 लाख से ₹25 लाख प्रति वर्ष के आकर्षक वेतन पैकेज मिल रहे हैं।
भारत का आत्मनिर्भर भविष्य: चिप्स का आयातक नहीं, निर्माता
आज दुनिया का लगभग 20% सेमीकंडक्टर डिजाइनिंग टैलेंट भारत में बैठता है। अब तक हम सिर्फ दूसरों के लिए चिप्स डिजाइन करते थे, लेकिन अब भारत उन चिप्स को अपनी धरती पर बनाएगा, पैकेज करेगा और पूरी दुनिया को निर्यात करेगा। अमेरिका के साथ हुआ यह ताजा समझौता भारत को वैश्विक चिप युद्ध में एक सुरक्षित, विश्वसनीय और अपरिहार्य शक्ति के रूप में स्थापित करेगा।
सेमीकंडक्टर क्रांति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और भारत के तकनीकी महाशक्ति बनने के सफर की हर प्रामाणिक रिपोर्ट के लिए हमारे टेक्नोलॉजी पोर्टल को नियमित रूप से फॉलो करते रहें।
क्वांटम कंप्यूटिंग और रक्षा क्षेत्र में सेमीकंडक्टर का सामरिक महत्व
सेमीकंडक्टर केवल हमारे फोन में रील देखने या गेम खेलने के लिए नहीं होते, बल्कि यह आधुनिक युद्धकला और राष्ट्रीय सुरक्षा की रीढ़ हैं। आधुनिक लड़ाकू विमान (जैसे राफेल और तेजस), गाइडेड मिसाइल सिस्टम, एयर डिफेंस रडार और परमाणु पनडुब्बियों के कंप्यूटर सिस्टम बिना उन्नत मिलिट्री-ग्रेड चिप्स के एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। कारगिल युद्ध के समय भारत को जीपीएस और सैटेलाइट डेटा के लिए विदेशी शक्तियों के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा था।
अमेरिका के साथ हुए इस नए समझौते में दोनों देशों ने रक्षा क्षेत्र में ‘क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज’ (iCET) के तहत रेडिएशन-हार्डेंड (Radiation-Hardened) मिलिट्री चिप्स के संयुक्त उत्पादन पर सहमति जताई है। ये विशेष चिप्स अत्यधिक तापमान, परमाणु विकिरण और अंतरिक्ष के शून्य दबाव में भी खराब नहीं होतीं। जब भारत इन चिप्स का उत्पादन अपने घरेलू फैब्स में करेगा, तो भारतीय सशस्त्र सेनाएं किसी भी विदेशी प्रतिबंध से पूरी तरह सुरक्षित रहेंगी।
भारत का सेमीकंडक्टर टैलेंट पूल: दुनिया को दिशा देती भारतीय प्रतिभा
यह बहुत कम लोग जानते हैं कि इंटेल, क्वालकॉम, ब्रॉडकॉम और एनवीडिया जैसी अमेरिकी कंपनियों के सिलिकॉन वैली स्थित मुख्यालयों में चिप डिजाइन करने वाले शीर्ष 25 से 30 प्रतिशत वैज्ञानिक और इंजीनियर्स भारतीय मूल के हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद और नोएडा में पहले से ही दुनिया के सबसे बड़े चिप डिजाइन सेंटर्स काम कर रहे हैं।
सेमीकॉन 2.0 मिशन के जरिए भारत सरकार उस ‘ब्रेन ड्रेन’ को ‘ब्रेन गेन’ में बदलने जा रही है। विदेशी कंपनियों में काम कर रहे वरिष्ठ भारतीय सेमीकंडक्टर वैज्ञानिकों को भारत लौटने और अपने स्टार्टअप्स शुरू करने के लिए सरकार ₹50 करोड़ तक का सीड फंड और 50% तक वित्तीय अनुदान दे रही है। इसका परिणाम यह होगा कि अगले 5 वर्षों में भारत न केवल चिप्स का विनिर्माण करेगा, बल्कि वैश्विक चिप डिजाइन पेटेंट्स का प्रमुख केंद्र बनकर उभरेगा।
