नई दिल्ली (पॉलिटिक्स व संवैधानिक डेस्क): भारत के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे बड़े और महत्वाकांक्षी चुनावी सुधार—‘एक देश, एक चुनाव’ (One Nation, One Election) को लेकर देश की विधायिका (संसद) और न्यायपालिका (सुप्रीम कोर्ट) के बीच शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक उदाहरण देखने को मिला है। संविधान के 129वें संशोधन विधेयक की गहन जांच के लिए गठित संयुक्त संसदीय समिति (Joint Parliamentary Committee – JPC) ने देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ प्रस्तावित अपनी ‘अनौपचारिक विचार-विमर्श बैठक’ को आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए स्पष्ट संस्थागत संकेतों के बाद यह निर्णय लिया गया, जिसमें यह साफ किया गया कि संसद द्वारा बनाए जाने वाले किसी भी कानून की भविष्य में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास सुरक्षित है, इसलिए कानून बनने से पहले जजों का संसदीय समिति से अनौपचारिक विचार-विमर्श करना संवैधानिक मर्यादा और न्यायिक निष्पक्षता के सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है।
क्या था पूरा घटनाक्रम? क्यों आयोजित होनी थी यह बैठक?
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्च-स्तरीय समिति की सिफारिशों के बाद केंद्र सरकार ने लोकसभा, सभी राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के चुनाव एक साथ कराने के लिए संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 संसद में पेश किया था। इस जटिल और युगांतरकारी विधेयक पर राष्ट्रीय सहमति बनाने और इसके कानूनी पहलुओं की जांच के लिए दोनों सदनों के सांसदों को मिलाकर एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का गठन किया गया था।
जेपीसी के अध्यक्ष और सदस्यों का विचार था कि चूंकि इस कानून को लागू करने के लिए संविधान के कम से कम 5 अनुच्छेदों (जैसे अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356) में बड़े संशोधन करने होंगे और विधानसभाओं के कार्यकाल को समय से पहले समाप्त या विस्तारित करना होगा, इसलिए देश के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक कानून विशेषज्ञों से अनौपचारिक चर्चा करके उनकी राय समझ ली जाए। इसके लिए समिति ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से समय मांगा था।

सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख: ‘शक्तियों के पृथक्करण’ का सम्मान जरूरी
सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष प्रशासनिक हलकों से बहुत स्पष्ट और परिपक्व संदेश दिया गया कि भारतीय संविधान का बुनियादी ढांचा (Basic Structure Doctrine) विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच स्पष्ट ‘लक्ष्मण रेखा’ खींचता है:
संसद का काम कानून बनाना है और न्यायपालिका का काम उस कानून के बनने के बाद यह देखना है कि क्या वह संविधान के अनुरूप है या नहीं। यदि सर्वोच्च अदालत के मौजूदा न्यायाधीश कानून बनने की प्रक्रिया के दौरान ही संसदीय समिति को अनौपचारिक सलाह देने लगेंगे, तो वे भविष्य में उस कानून की निष्पक्ष सुनवाई करने की अपनी संवैधानिक पात्रता खो बैठेंगे। जब भी ‘एक देश, एक चुनाव’ का कानून पास होगा, तो उसे निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में चुनौती दी जाएगी। ऐसे में जजों का किसी पूर्व-चर्चा में शामिल होना न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों (Natural Justice) के विपरीत होगा। शीर्ष अदालत के इस गरिमापूर्ण रुख को समझते हुए जेपीसी ने बैठक के प्रस्ताव को तत्काल वापस ले लिया।
‘एक देश, एक चुनाव’ पर देश में क्या है राजनीतिक मतभेद?
इस संवैधानिक घटनाक्रम के बीच संयुक्त संसदीय समिति देश के विभिन्न राज्यों में राजनीतिक दलों, मुख्यमंत्रियों और विधि विशेषज्ञों के साथ अपनी औपचारिक बैठकों का दौर जारी रखे हुए है। इस मुद्दे पर देश की राजनीति दो ध्रुवों में बंटी हुई है:
सत्तारूढ़ एनडीए (NDA) का पक्ष: सरकार का तर्क है कि देश में हर साल 4 से 5 राज्यों में चुनाव होते रहते हैं। इसके कारण पूरे वर्ष आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) लगी रहती है, जिससे विकास कार्य ठप हो जाते हैं, अरबों रुपये का सरकारी खजाना बर्बाद होता है और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती से सीमाओं की सुरक्षा पर असर पड़ता है। यदि पांच साल में एक बार चुनाव होंगे तो देश में नीतिगत स्थिरता आएगी और आर्थिक विकास दर तेज होगी।
विपक्षी दलों (INDIA ब्लॉक) की आपत्तियां: दूसरी ओर, कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, आप और क्षेत्रीय दलों का आरोप है कि एक साथ चुनाव कराना भारत के ‘संघीय ढांचे’ (Federalism) पर सीधा प्रहार है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय मुद्दों के शोर में राज्यों के स्थानीय मुद्दे दब जाएंगे और देश में अप्रत्यक्ष रूप से एकात्मक शासन व्यवस्था स्थापित हो जाएगी। इसके अलावा यदि केंद्र या किसी राज्य में त्रिशंकु विधानसभा बनती है या अविश्वास प्रस्ताव से सरकार गिरती है, तो 5 साल का कार्यकाल कैसे पूरा होगा, इसका कोई स्पष्ट संवैधानिक समाधान नहीं है।
जेपीसी का अगला कदम: राज्य विधानसभाओं और जनता से राय
बैठक रद्द होने के बाद अब जेपीसी ने अपना ध्यान राज्य स्तर पर जन-परामर्श बढ़ाने पर केंद्रित किया है। समिति ने देश के सभी 28 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों, राज्य निर्वाचन आयुक्तों और विभिन्न उच्च न्यायालयों के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों से लिखित सुझाव मांगे हैं। इसके अलावा आम जनता के लिए भी संसद के ऑनलाइन पोर्टल पर सुझाव देने की विंडो खोल दी गई है।
संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि 129वें संशोधन विधेयक को संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई विशेष बहुमत (Special Majority) से पारित कराना होगा और साथ ही देश के कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं से इसका अनुमोदन कराना अनिवार्य होगा। इसके बाद ही 2029 या 2034 के आम चुनावों से इस व्यवस्था को लागू करने का वास्तविक रोडमैप तैयार हो सकेगा।
जेपीसी और सुप्रीम कोर्ट के बीच इस संवैधानिक लक्ष्मण रेखा के सम्मान ने भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता को एक बार फिर दुनिया के सामने साबित किया है। ‘एक देश, एक चुनाव’, संसद की कार्यप्रणाली और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हर ऐतिहासिक विमर्श के गहन विश्लेषण के लिए हमारे पॉलिटिक्स एवं राष्ट्रीय मामले पेज को पढ़ते रहें।
संसदीय समितियों की कार्यप्रणाली और न्यायिक स्वतंत्रता की सीमाएं
भारत में संसदीय समितियां (जैसे जेपीसी, स्टैंडिंग कमेटी) कानून बनाने की प्रक्रिया में संसद की रीढ़ होती हैं। वे विशेषज्ञों, उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों और नागरिक संगठनों को बुलाकर उनके बयान दर्ज करती हैं। लेकिन न्यायपालिका का स्थान किसी भी अन्य गवाह या विशेषज्ञ से बिल्कुल अलग है। सुप्रीम कोर्ट संविधान का अंतिम व्याख्याकार और रक्षक (Guardian of the Constitution) है।
यदि संसद के सांसद जजों से अनौपचारिक सलाह लेने लगेंगे, तो न्यायपालिका की वह स्वतंत्रता और निष्पक्षता खत्म हो जाएगी जिसके दम पर वह सरकार के असंवैधानिक कानूनों को निरस्त (Strike Down) करने का साहस रखती है। पूर्व मुख्य न्यायाधीशों ने भी इस बात की सराहना की है कि सुप्रीम कोर्ट ने बहुत ही शालीनता और दृढ़ता के साथ संस्थागत सीमाओं का पालन किया।
आर्थिक बचत बनाम लोकतांत्रिक विविधता: क्या है अंतिम समाधान?
‘एक देश, एक चुनाव’ पर अंतिम फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या भारत अपनी विशाल बहुदलीय लोकतांत्रिक विविधता को बनाए रखते हुए चुनावी खर्चों और नीतिगत रुकावटों को कम करने का कोई बीच का रास्ता निकाल पाता है या नहीं। कुछ विशेषज्ञों का सुझाव है कि पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने के बजाय दो चरणों का मॉडल अपनाया जा सकता है, जिसमें लोकसभा के साथ आधे राज्यों के चुनाव हों और ढाई साल बाद शेष राज्यों के चुनाव कराए जाएं। जेपीसी अपनी अंतिम रिपोर्ट में इस सुझाव पर भी विचार कर रही है।
