नई दिल्ली (पॉलिटिक्स व लीगल डेस्क): देश की शीर्ष अदालत, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के संशोधन और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की शुचिता को लेकर दायर एक बेहद गंभीर याचिका पर केंद्र सरकार, निर्वाचन आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को औपचारिक कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की विशेष संवैधानिक पीठ ने विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA) ब्लॉक के शीर्ष नेताओं—लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, और कई नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा दायर संयुक्त याचिका पर यह अहम आदेश पारित किया। अदालत ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया है कि वह देश भर में चलाए जा रहे ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम कथित रूप से बिना उचित प्रक्रिया के काटे जाने के आरोपों पर तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करे।
याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलों पर क्या उठाए गए गंभीर सवाल?
सुप्रीम कोर्ट में दायर 120 पन्नों की इस विस्तृत याचिका में निर्वाचन आयोग के आंतरिक कामकाज और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर बुनियादी सवाल खड़े किए गए हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए देश के वरिष्ठ वकीलों ने अदालत में दलील दी कि भारत का संविधान चुनाव आयोग को एक बहु-सदस्यीय संस्था (Multi-Member Body) के रूप में देखता है, जहां मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) के पास समान मताधिकार और निर्णय लेने की शक्ति होती है।
याचिका में गंभीर आरोप लगाया गया है कि वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण (SIR), फॉर्म-7 के थोक निस्तारण और नए डिजिटल सॉफ्टवेयर ‘ECINet’ के क्रियान्वयन जैसे राष्ट्रीय महत्व के नीतिगत मामलों में दोनों साथी चुनाव आयुक्तों की औपचारिक सहमति या सर्वसम्मति (Concurrence) लिए बिना एकतरफा प्रशासनिक आदेश जारी किए हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि आयोग के अंदर आंतरिक लोकतंत्र और सामूहिक विचार-विमर्श का अभाव सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 324 और चुनाव आयोग (सेवा शर्तें) अधिनियम के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन है।

थोक विलोपन का विवाद: गरीब और वंचित मतदाताओं के नाम गायब होने का आरोप
याचिका का दूसरा और सबसे संवेदनशील बिंदु स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान मतदाताओं के नाम हटाए जाने का है। याचिकाकर्ताओं ने विभिन्न राज्यों के चुनाव आंकड़ों का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग के नाम पर लाखों मतदाताओं को ‘मृत’, ‘स्थायी रूप से स्थानांतरित’ या ‘डुप्लीकेट’ की श्रेणी में डालकर उनके नाम वोटर लिस्ट से डिलीट कर दिए गए हैं।
विपक्षी दलों का आरोप है कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में कड़ा चुनावी मुकाबला था, वहां झुग्गी-बस्तियों, प्रवासी मजदूरों, अल्पसंख्यकों और ग्रामीण गरीबों के नाम बिना उनके घर पर कोई नोटिस दिए काट दिए गए। जब ये नागरिक मतदान के दिन पोलिंग बूथ पर पहुंचते हैं, तो उन्हें पता चलता है कि उनका नाम सूची में है ही नहीं। याचिका में यह गुहार लगाई गई थी कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले की पूरी जांच नहीं कर लेता, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त के एकतरफा अधिकारों पर रोक लगाई जाए और सभी डिलीट किए गए नामों का अनिवार्य रूप से सार्वजनिक इंडिपेंडेंट ऑडिट कराया जाए।
सुप्रीम कोर्ट का संतुलित रुख: अंतरिम रोक से इनकार, लेकिन जवाबदेही तय
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने याचिकाकर्ताओं की उस मांग को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज पर तत्काल अंतरिम रोक लगाने की अपील की गई थी। शीर्ष अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि निर्वाचन आयोग देश की एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था है और आगामी विधानसभा चुनावों के बीच आयोग के शीर्ष नेतृत्व को पंगु (Paralyze) नहीं किया जा सकता। किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ केवल आरोपों के आधार पर बिना उनका पक्ष सुने कोई एकतरफा आदेश पारित नहीं किया जा सकता।
हालांकि अदालत ने यह भी दो-टूक कहा कि लोकतंत्र में नागरिकों के मताधिकार की पवित्रता से कोई समझौता नहीं हो सकता। यदि आयोग के नए सॉफ्टवेयर या प्रक्रिया में कोई खामी है जिससे वैध नागरिक मताधिकार से वंचित हो रहे हैं, तो यह गंभीर न्यायिक समीक्षा का विषय है। इसी संतुलन को साधते हुए अदालत ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर तीन हफ्ते में निम्नलिखित बिंदुओं पर स्पष्ट हलफनामा मांगा है:
1. क्या चुनाव आयोग के तीनों आयुक्तों के बीच सभी बड़े नीतिगत फैसलों पर औपचारिक बैठकें और सर्वसम्मति दर्ज की जाती हैं?
2. स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के तहत हटाए गए प्रत्येक नाम के लिए क्या व्यक्तिगत कानूनी नोटिस और सुनवाई का मौका दिया गया?
3. क्या आयोग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ डिलीट किए गए नामों की विधानसभा-वार पूरी सूची साझा करने के लिए तैयार है?
चुनाव आयोग का जवाब और आगामी नवंबर की सुनवाई
निर्वाचन आयोग की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को भरोसा दिलाया कि आयोग पूरी पारदर्शिता के साथ काम कर रहा है और भारत की मतदाता सूचियों को त्रुटिहीन बनाना आयोग का संवैधानिक दायित्व है। उन्होंने कहा कि फर्जी और डुप्लीकेट वोटों को हटाना ही निष्पक्ष चुनाव की पहली शर्त है। आयोग तीन सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली निर्णायक सुनवाई नवंबर के तीसरे सप्ताह में सूचीबद्ध की है।
सुप्रीम कोर्ट की इस सक्रियता ने यह साफ कर दिया है कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही सर्वोपरि है। भारतीय राजनीति, न्यायपालिका और संवैधानिक व्यवस्था की हर बड़ी हलचल और निष्पक्ष कानूनी विश्लेषण के लिए हमारे पॉलिटिक्स सेक्शन को नियमित रूप से फॉलो करें।
संविधान का अनुच्छेद 324 और चुनाव आयोग का आंतरिक ढांचा
भारत के संविधान का अनुच्छेद 324 देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने की सर्वोच्च जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग को सौंपता है। 1989 तक चुनाव आयोग केवल एक सदस्यीय निकाय हुआ करता था। लेकिन टी.एन. शेषन के ऐतिहासिक कार्यकाल के बाद 1993 में संसद ने कानून पारित करके इसे स्थायी रूप से तीन सदस्यीय आयोग बना दिया, ताकि कोई भी मुख्य चुनाव आयुक्त अपनी मर्जी से मनमाने फैसले न ले सके।
कानून के अनुसार यदि किसी नीतिगत मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद होता है, तो बहुमत (Majority Vote) के आधार पर फैसला लिया जाना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका का सबसे संवेदनशील कानूनी पहलू यही है कि क्या स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) जैसे गंभीर नीतिगत फैसले में बहुमत और औपचारिक सहमति की संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया गया था या नहीं। कोर्ट का यह फैसला भविष्य के लिए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली के नए मील के पत्थर तय करेगा।
मतदाता सूची शुद्धिकरण और नागरिक अधिकारों का संतुलन
संवैधानिक न्यायशास्त्रियों का मानना है कि फर्जी मतदान को रोकना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना भी है कि एक भी निर्दोष भारतीय नागरिक अपनी ही चुनी हुई सरकार को चुनने के अधिकार से वंचित न हो। सुप्रीम कोर्ट द्वारा हलफनामा तलब किए जाने से निर्वाचन आयोग की जवाबदेही देश की लोकतांत्रिक जनता के प्रति और अधिक मजबूत होगी।
