सैटेलाइट इंटरनेट पर संसदीय समिति सख्त: स्टारलिंक, जियो और वनवेब को समन, स्पेक्ट्रम नीलामी व इन-कंट्री डेटा सुरक्षा पर होगी विस्तृत जांच

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Advanced satellite internet communication receiver dish under starry sky with low earth orbit satellites

नई दिल्ली (टेक डेस्क): भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के शुरू होने से पहले ही इस पर बड़ा राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी विवाद छिड़ गया है। आज 14 अक्टूबर 2026 को संसद की संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on IT) ने देश में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड शुरू करने की रेस में शामिल दुनिया की दिग्गज कंपनियों – एलन मस्क की Starlink, मुकेश अंबानी की Reliance Jio SpaceFiber और सुनील भारती मित्तल की Airtel OneWeb (Eutelsat OneWeb) के शीर्ष अधिकारियों को आधिकारिक समन जारी कर दिया है। समिति ने साफ कर दिया है कि भारत में सैटेलाइट स्पेक्ट्रम के आवंटन के तरीके, लाइसेंसिंग शर्तों और सबसे बढ़कर भारतीय नागरिकों के निजी डेटा की सुरक्षा (In-Country Data Storage) पर बेहद सख्त जांच की जाएगी।

📌 भारत में सैटेलाइट इंटरनेट: मुख्य बातें और विवाद के कारण (Key Highlights)

  • संसदीय समिति का समन: स्टारलिंक, जियो स्पेसफाइबर और वनवेब के अधिकारियों को 29 अक्टूबर को पेश होने का आदेश
  • स्पेक्ट्रम का बड़ा विवाद: स्पेक्ट्रम की नीलामी (Auction) हो या प्रशासनिक आधार पर सीधा आवंटन (Administrative Allocation)
  • डेटा सुरक्षा की अनिवार्य शर्त: भारतीय यूजर्स का सारा इंटरनेट ट्रैफिक और डेटा देश के भीतर बने ग्राउंड गेटवे सर्वर्स पर ही स्टोर होना चाहिए
  • इंटरनेट स्पीड का दावा: बिना फाइबर केबल और मोबाइल टावर के सीधे अंतरिक्ष से 100 Mbps से 250 Mbps तक की सुपरफास्ट स्पीड
  • दुर्गम इलाकों में वरदान: हिमालय के सुदूर गांवों, रेगिस्तानों, द्वीपों और समंदर में भी मिलेगा हाई-स्पीड इंटरनेट
  • सुरक्षा एजेंसियों की मांग: राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर वैध मॉनिटरिंग और सुरक्षा प्रोटोकॉल का शत-प्रतिशत पालन अनिवार्य

Satellite Internet in India: स्टारलिंक, जियो और वनवेब को संसदीय समिति ने क्यों भेजा समन?

भारत सरकार ने नए दूरसंचार अधिनियम (Telecommunications Act) के जरिए सैटेलाइट स्पेक्ट्रम को नीलामी की जगह प्रशासनिक रूप से आवंटित करने का रास्ता खोला था। लेकिन इस फैसले के बाद से ही भारतीय दूरसंचार कंपनियों और विदेशी कंपनियों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई थी। संसदीय समिति का मानना है कि सैटेलाइट इंटरनेट सिर्फ बिजनेस का मामला नहीं है, बल्कि यह देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ा हुआ गंभीर मुद्दा है।

समिति के अध्यक्ष और सांसदों ने चिंता जताई है कि अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) सैटेलाइट्स के जरिए अगर सीधे भारतीय नागरिकों के घरों में इंटरनेट पहुंचाया जाएगा, तो सुरक्षा एजेंसियों को यह पक्का करना होगा कि डेटा किसी विदेशी सर्वर पर न भेजा जाए। समिति ने 29 अक्टूबर 2026 को सभी कंपनियों के तकनीकी और कानूनी प्रमुखों को तलब किया है, जहां उनसे लाइसेंसिंग फीस, सिक्योरिटी क्लीयरेंस और डेटा रूटिंग को लेकर तीखे सवाल पूछे जाएंगे।

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Spectrum Allocation Controversy: स्पेक्ट्रम नीलामी होगी या सीधा आवंटन? मस्क और अंबानी में क्यों छिड़ी जंग?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा घमासान स्पेक्ट्रम आवंटन के नियम को लेकर मचा हुआ है। एलन मस्क की स्टारलिंक और अमेजन का कुइपर प्रोजेक्ट चाहते हैं कि भारत में भी दुनिया के अन्य देशों की तरह सैटेलाइट स्पेक्ट्रम बिना नीलामी के प्रशासनिक आधार पर तय सरकारी फीस लेकर दिया जाए। मस्क का तर्क है कि सैटेलाइट स्पेक्ट्रम एक साझा प्राकृतिक संसाधन है, जिसे पारंपरिक मोबाइल टावर स्पेक्ट्रम की तरह नीलाम नहीं किया जा सकता।

वहीं दूसरी तरफ रिलायंस जियो और वोडाफोन-आइडिया का सख्त कहना है कि जब भारतीय टेलीकॉम कंपनियों ने 4G और 5G स्पेक्ट्रम खरीदने के लिए सरकारी नीलामियों में लाखों करोड़ रुपये खर्च किए हैं, तो विदेशी कंपनियों को बिना नीलामी के सस्ता स्पेक्ट्रम देकर ‘अनफेयर एडवांटेज’ नहीं मिलना चाहिए। जियो की मांग है कि ‘सेम सर्विस, सेम रूल्स’ (Same Service, Same Rules) का सिद्धांत लागू होना चाहिए ताकि घरेलू कंपनियों के हितों की रक्षा हो सके।

Satellite Internet Terminal and Smartphone Connectivity India
तस्वीर: सैटेलाइट इंटरनेट से सीधे कनेक्ट होने वाले आधुनिक डिजिटल डिवाइसेज और यूजर टर्मिनल रिसीवर

How Satellite Internet Works: बिना मोबाइल टावर के सीधे अंतरिक्ष से कैसे चलेगा सुपरफास्ट इंटरनेट?

आम तौर पर हमारे घरों में इंटरनेट या तो जमीन के नीचे बिछी ऑप्टिकल फाइबर केबल से आता है या नजदीकी मोबाइल टावर से 4G/5G सिग्नल के जरिए। लेकिन देश के कई पहाड़ी, जंगली और दूरदराज के इलाके ऐसे हैं जहां केबल बिछाना या टावर लगाना नामुमकिन जैसा है। सैटेलाइट इंटरनेट इसी समस्या का सबसे आधुनिक समाधान है।

इसमें पृथ्वी की सतह से 500 से 1,200 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में हजारों छोटे-छोटे उपग्रह (LEO Satellites) एक जाल की तरह चक्कर लगाते हैं। जब यूजर अपने घर की छत पर एक छोटा डिश एंटीना (User Terminal) लगाता है, तो वह एंटीना सीधे ऊपर से गुजर रहे सैटेलाइट से सिग्नल पकड़ता है। यह सैटेलाइट सिग्नल को भारत में बने ग्राउंड स्टेशन (Earth Gateway) पर भेजता है, जो मुख्य इंटरनेट बैकबोन से जुड़ा होता है। चूंकि ये सैटेलाइट पृथ्वी के काफी नजदीक होते हैं, इसलिए इसमें लेटेंसी (डिले) मात्र 25 से 35 मिलीसेकंड रहती है, जिससे वीडियो कॉलिंग, गेमिंग और ऑनलाइन क्लासेज बिना किसी रुकावट के मक्खन की तरह चलती हैं।

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Internet Speed & Plan Pricing: भारत में कितनी मिलेगी स्पीड और कितना होगा महीने का खर्च?

स्पीड की बात करें तो स्टारलिंक और जियो स्पेसफाइबर दोनों ने ही भारत में 100 Mbps से लेकर 250 Mbps तक की डाउनलोड स्पीड और 20 से 40 Mbps की अपलोड स्पीड देने का दावा किया है। यह स्पीड सामान्य फाइबर ब्रॉडबैंड के बिल्कुल बराबर है, जिस पर 4K अल्ट्रा-एचडी वीडियो स्ट्रीमिंग आसानी से हो सकती है।

कीमत की बात करें तो भारत जैसे प्राइस-सेंसिटिव बाजार में स्टारलिंक के विदेशी प्लान (जो अमेरिका में ₹8,000 से ₹10,000 प्रति माह हैं) नहीं चल सकते। जानकारों के मुताबिक, स्टारलिंक भारत के लिए एक स्पेशल ‘इंडिया प्लान’ पेश कर सकती है, जिसकी मासिक फीस लगभग ₹1,500 से ₹2,500 के बीच हो सकती है। वहीं हार्डवेयर किट (डिश और वाई-फाई राउटर) की कीमत लगभग ₹25,000 से ₹30,000 हो सकती है। दूसरी तरफ रिलायंस जियो स्पेसफाइबर इस सर्विस को ग्रामीण इलाकों के लिए ₹800 से ₹1,200 प्रति माह के बेहद किफायती प्लान में लाने की तैयारी में है, जिसमें डिश एंटीना फ्री इंस्टॉलेशन के साथ आसान ईएमआई पर दिया जाएगा।

National Security & Data Privacy: भारत सरकार के लिए डेटा सुरक्षा की क्या-क्या प्रमुख शर्तें हैं?

गृह मंत्रालय (MHA), दूरसंचार विभाग (DoT) और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने विदेशी सैटेलाइट कंपनियों के सामने बेहद कड़े सुरक्षा नियम रखे हैं। इनमें सबसे पहली और अनिवार्य शर्त यह है कि भारत का सारा यूजर डेटा भारत की भौगोलिक सीमा के भीतर ही प्रोसेस और स्टोर किया जाएगा। इसके लिए स्टारलिंक और अन्य कंपनियों को भारत में कम से कम 4 से 6 बड़े लोकल अर्थ स्टेशन (गेटवे) बनाने होंगे।

दूसरी शर्त यह है कि सैटेलाइट से आने वाले किसी भी सिग्नल को सुरक्षा एजेंसियां आपातकालीन स्थिति में मॉनिटर करने की तकनीकी क्षमता रखेंगी। सीमावर्ती इलाकों जैसे जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और पूर्वोत्तर राज्यों में सिग्नल ट्रांसमिशन के लिए स्पेशल सिक्योरिटी ऑडिट पास करना होगा। स्टारलिंक ने सरकार को भरोसा दिया है कि वह सभी भारतीय सुरक्षा नियमों का पूरी तरह पालन करने को तैयार है।

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Satellite Internet Launch Date in India: आम लोगों के घरों तक कब पहुंचेगी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा?

संसदीय समिति की 29 अक्टूबर की बैठक के बाद सुरक्षा क्लीयरेंस की प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है। दूरसंचार विभाग से सभी अंतिम मंजूरियां मिलने के बाद दिसंबर 2026 या जनवरी 2027 की शुरुआत में पायलट आधार पर सैटेलाइट इंटरनेट का कमर्शियल रोलआउट शुरू हो सकता है।

शुरुआती चरण में यह सेवा अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप के द्वीपों, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के दुर्गम सीमावर्ती गांवों, पूर्वोत्तर राज्यों के सुदूर क्षेत्रों और समंदर में जाने वाले जहाजों व एयरलाइंस को दी जाएगी। उसके बाद आम नागरिक भी ऑनलाइन ऑर्डर करके अपनी छत पर यह मैजिकल डिश लगवा सकेंगे और बिना किसी केबल कटने की टेंशन के 24 घंटे हाई-स्पीड इंटरनेट का आनंद ले सकेंगे।

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