सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: ₹2000 से ऊपर के UPI मर्चेंट लेन-देन पर 0.4% MDR चार्ज पर रोक से इनकार, जानें 15 अक्टूबर से आप पर क्या असर होगा

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Supreme Court of India and digital UPI payments QR code display

नई दिल्ली (पॉलिटिक्स व लीगल डेस्क): देश की शीर्ष अदालत, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) चार्ज लागू करने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए किसी भी प्रकार की न्यायिक दखलंदाजी से साफ इनकार कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की विशेष पीठ ने दो-टूक शब्दों में कहा कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर शुल्क लगाना या उसे पूर्णतः निशुल्क रखना केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का नीतिगत और आर्थिक अधिकार क्षेत्र है, जिसमें अदालत आदेश जारी नहीं कर सकती। इस महत्वपूर्ण फैसले के बाद आम उपभोक्ताओं, छोटे खुदरा व्यापारियों और फिनटेक कंपनियों के बीच यूपीआई शुल्कों को लेकर चल रही सभी तरह की अफवाहों और भ्रांतियों पर विराम लग गया है।

क्या था पूरा मामला और सुप्रीम कोर्ट में क्या दी गई थी दलीलें?

यह मामला पेमेंट्स काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) और कुछ प्रमुख फिनटेक सर्विस प्रोवाइडर्स द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं की मुख्य दलील थी कि देश में यूपीआई का वॉल्यूम हर महीने 15 अरब लेन-देन से ऊपर पहुंच चुका है। लेकिन केंद्र सरकार द्वारा 1 जनवरी 2020 से ‘जीरो एमडीआर’ (Zero MDR) नीति लागू करने के कारण बैंकों और फिनटेक कंपनियों (जैसे फोनपे, गूगल पे, पेटीएम) को डिजिटल सर्वर, साइबर सुरक्षा इन्फ्रास्ट्रक्चर और तकनीकी रखरखाव पर हर साल ₹12,000 करोड़ से अधिक का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

याचिका में मांग की गई थी कि ₹2,000 से अधिक के बड़े कमर्शियल मर्चेंट लेन-देन पर 0.4% से 0.6% का मामूली एमडीआर शुल्क लगाने की अनुमति दी जाए, ताकि भुगतान नेटवर्क की गुणवत्ता और साइबर सुरक्षा को बनाए रखा जा सके। हालांकि केंद्र सरकार के सॉलिसिटर जनरल ने अदालत के सामने स्पष्ट किया कि देश को कैशलेस डिजिटल अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए यूपीआई को निशुल्क रखना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और सरकार बैंकों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए सालाना बजटीय सब्सिडी प्रदान कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस रुख से सहमति जताते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

आम जनता पर क्या होगा असर? क्या आपकी जेब से कटेगा एक भी रुपया?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले और नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के स्पष्टीकरण के बाद यह पूरी तरह साफ हो गया है कि आम नागरिकों के लिए यूपीआई भुगतान 100% निशुल्क बना रहेगा:

1. पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांसफर: जब आप अपने किसी दोस्त, रिश्तेदार, दूधवाले या ऑटो ड्राइवर के व्यक्तिगत यूपीआई क्यूआर कोड या मोबाइल नंबर पर पैसे भेजते हैं, तो उस पर कोई शुल्क नहीं लगेगा, चाहे रकम ₹100 हो या ₹1,00,000।
2. छोटे दुकानदार और सब्जी विक्रेता (P2M): गली-मोहल्ले के किराना स्टोर, फल-सब्जी विक्रेता, चाय की दुकान या स्थानीय ढाबों पर लगे नॉर्मल क्यूआर कोड पर पेमेंट करने पर ग्राहक से कोई अतिरिक्त चार्ज नहीं काटा जाएगा।
3. बैंक खाते से सीधा भुगतान: आपके सेविंग्स अकाउंट से होने वाले किसी भी सामान्य यूपीआई ट्रांसफर पर बैंक कोई सर्विस चार्ज नहीं काट सकते।

तो फिर 0.4% से 1.1% चार्ज किस पर और कब लगता है? भ्रांति दूर करें

सोशल मीडिया पर अक्सर यह अफवाह फैलाई जाती है कि 15 अक्टूबर से हर यूपीआई लेन-देन पर टैक्स या चार्ज कटेगा। एनपीसीआई के आधिकारिक दिशानिर्देशों के अनुसार वास्तविकता यह है:

शुल्क केवल और केवल प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट्स (PPI Wallets) के जरिए किए जाने वाले बड़े मर्चेंट लेन-देन पर लागू होता है, वह भी तब जब रकम ₹2,000 से अधिक हो। उदाहरण के लिए, यदि कोई ग्राहक अपने फोनपे वॉलेट, पेटीएम वॉलेट, या मोबिक्विक वॉलेट में क्रेडिट कार्ड से पैसे डालकर किसी बड़े कॉर्पोरेट स्टोर (जैसे रिलायंस रिटेल, क्रोमा या पेट्रोल पंप) पर ₹2,000 से अधिक का भुगतान करता है, तो वहां इंटरचेंज फीस मर्चेंट से ली जाती है, ग्राहक से नहीं। यदि आप वॉलेट का इस्तेमाल न करके सीधे अपने बैंक खाते से यूपीआई पिन डालकर भुगतान करते हैं, तो कोई भी व्यापारी या कंपनी आपसे एक पैसे का भी अतिरिक्त चार्ज नहीं वसूल सकती।

फिनटेक कंपनियों और बैंकों की वित्तीय चुनौतियां

भले ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले से आम उपभोक्ताओं को राहत मिली है, लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय बैंकिंग और फिनटेक सेक्टर के लिए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। देश में रोजाना लगभग 45 करोड़ यूपीआई ट्रांजैक्शंस प्रोसेस होते हैं। हर ट्रांजैक्शन पर सर्वर लोड, ओटीपी कॉस्ट, फ्रॉड डिटेक्शन और क्लाउड होस्टिंग का खर्च आता है।

वित्तीय वर्ष 2024-25 में केंद्र सरकार ने डिजिटल पेमेंट्स को बढ़ावा देने के लिए बैंकों को लगभग ₹3,500 करोड़ की प्रोत्साहन सब्सिडी (Incentive Scheme) दी थी। हालांकि बैंकर्स एसोसिएशन का कहना है कि यह राशि उनके वास्तविक लागत खर्च की तुलना में काफी कम है। बैंक अब रेवेन्यू जुटाने के लिए यूपीआई के जरिए पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड ऑन यूपीआई (RuPay Credit Card), और मर्चेंट्स को साउंडबॉक्स और पीओएस मशीनों के मासिक किराए जैसे नए मॉडल पर तेजी से ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।

डिजिटल लेन-देन में सुरक्षा: साइबर फ्रॉड से बचने के 4 सुनहरे नियम

यूपीआई के व्यापक प्रसार के साथ-साथ ऑनलाइन साइबर ठगी के मामलों में भी वृद्धि हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी टिप्पणी में डिजिटल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही। हर यूपीआई यूजर को इन नियमों का पालन करना चाहिए:

1. पैसे प्राप्त करने के लिए कभी पिन नहीं डालना होता: हमेशा याद रखें कि किसी से पैसे रिसीव करने के लिए यूपीआई पिन की जरूरत नहीं होती। यदि कोई व्यक्ति आपसे कहता है कि “पैसे पाने के लिए अपना पिन डालें या क्यूआर स्कैन करें”, तो वह 100% फ्रॉड है।
2. अज्ञात क्यूआर कोड स्कैन न करें: सोशल मीडिया या व्हाट्सएप पर अज्ञात लॉटरी, इनाम या कैशबैक के नाम पर भेजे गए क्यूआर कोड को कभी स्कैन न करें।
3. यूपीआई लाइट (UPI Lite) का उपयोग करें: ₹500 तक के छोटे भुगतानों के लिए यूपीआई लाइट वॉलेट का उपयोग करें। इसमें बिना पिन डाले तुरंत भुगतान हो जाता है और बैंक पासबुक में दर्जनों छोटी एंट्रियां नहीं भरतीं।
4. फ्रॉड होने पर तुरंत 1930 पर कॉल करें: यदि आपके साथ किसी भी तरह का डिजिटल वित्तीय फ्रॉड होता है, तो तुरंत राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज कराएं, ताकि ट्रांसफर की गई रकम को तुरंत फ्रीज कराया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का पहिया आम जनता के हितों को सर्वोपरि रखकर ही आगे बढ़ेगा। राष्ट्रीय नीतियों, सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णयों और प्रशासनिक व्यवस्था की सटीक खबरों के लिए हमारे पॉलिटिक्स एवं गवर्नेंस पोर्टल पर विजिट करते रहें।

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