सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्ति मामले पर बड़ी सुनवाई: CEC और चुनाव आयुक्तों की चयन प्रक्रिया पर संवैधानिक पीठ का अहम रुख, जानें पूरा कानूनी विवाद

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Supreme Court of India building exterior in New Delhi

नई दिल्ली (संवैधानिक एवं राजनीतिक डेस्क): भारत के लोकतांत्रिक ताने-बाने, निष्पक्ष चुनाव प्रणाली और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में एक बार फिर ऐतिहासिक कानूनी बहस छिड़ गई है। उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) ने केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली विभिन्न जनहित याचिकाओं पर गंभीर रुख अपनाते हुए मामले को बड़ी संविधान पीठ (Constitution Bench) के समक्ष विचारार्थ भेजने के संकेत दिए हैं।

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयुक्त नियुक्ति विवाद – प्रमुख कानूनी बिंदु:

  • विवाद का मुख्य केंद्र: 2023 के नए अधिनियम के तहत चयन समिति (Selection Committee) से भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India – CJI) को हटाकर एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया जाना।
  • वर्तमान 3-सदस्यीय चयन समिति: 1. प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), 2. केंद्रीय कैबिनेट मंत्री (पीएम द्वारा नामित), और 3. लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता)।
  • याचिकाकर्ताओं की आपत्ति: चयन समिति में सत्ताधारी दल का 2:1 का पूर्ण बहुमत हो जाने से चुनाव आयोग की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) के सिद्धांत का हनन होता है।
  • केंद्र सरकार का आधिकारिक पक्ष: संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत संसद को कानून बनाने का संप्रभु अधिकार है; न्यायपालिका संसद द्वारा पारित वैध कानून को निरस्त नहीं कर सकती।
  • दूरगामी असर: आगामी राज्य विधानसभा चुनावों और भारत के भविष्य की लोकतांत्रिक विश्वसनीयता पर इस न्यायिक फैसले का गहरा प्रभाव पड़ेगा।

1. कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि: अनूप बरनवाल फैसला (मार्च 2023)

इस पूरे मामले की जड़ें मार्च 2023 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के एक अभूतपूर्व फैसले से जुड़ी हैं। जस्टिस के.एम. जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (Anoop Baranwal vs Union of India) मामले में सर्वसम्मति से व्यवस्था दी थी कि जब तक देश की संसद कोई कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति तीन सदस्यीय समिति की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। उस समिति में:

  1. भारत के प्रधानमंत्री,
  2. लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता), और
  3. भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल थे।

संविधान पीठ ने तब अपनी विस्तृत टिप्पणी में कहा था कि “एक निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी चुनाव आयोग ही एक सच्चे लोकतंत्र का आधार है। यदि चुनाव कराने वाली संस्था स्वयं कार्यपालिका की कृपा पर निर्भर रहेगी, तो निष्पक्ष चुनाव की कल्पना ही समाप्त हो जाएगी।”

2. संसद द्वारा दिसंबर 2023 का नया अधिनियम और कानूनी टकराव

मार्च 2023 के फैसले के बाद, केंद्र सरकार ने शीतकालीन सत्र में ‘The Chief Election Commissioner and other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023’ संसद में पेश किया और इसे दोनों सदनों से पारित करवाया।

इस नए कानून की धारा 7 में चयन समिति की नई संरचना बनाई गई, जिसमें से सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को पूरी तरह बाहर कर दिया गया और उनके स्थान पर प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री को बैठा दिया गया। इसके परिणामस्वरूप तीन सदस्यीय समिति में सरकार का स्पष्ट बहुमत (2-1) सुनिश्चित हो गया।

विपक्षी दलों और चुनाव सुधार से जुड़ी संस्थाओं जैसे एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), डॉ. जया ठाकुर और वरिष्ठ वकीलों ने इसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रभाव को निष्प्रभावी करने और चुनाव आयोग को कार्यपालिका की ‘जेब’ में डालने वाला कानून करार दिया।

3. सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों की प्रमुख कानूनी दलीलें

पक्षकारप्रमुख कानूनी तर्क (Core Arguments)संवैधानिक प्रावधान एवं नजीरें
याचिकाकर्ता (ADR, जया ठाकुर आदि)कार्यपालिका स्वयं चुनावों में एक पक्षकार (Party) होती है। जो खुद चुनाव लड़ रहा है, वही अगर चुनाव कराने वाले अंपायर का चयन करेगा तो ‘हितों का टकराव’ (Conflict of Interest) पैदा होगा। CJI की उपस्थिति ही निष्पक्षता की एकमात्र गारंटी थी।अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 324, और संविधान का मूल ढांचा (केसवानंद भारती केस)
केंद्र सरकार (Union of India)संविधान के अनुच्छेद 324(2) में स्पष्ट लिखा है कि राष्ट्रपति संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत नियुक्तियां करेंगे। सुप्रीम कोर्ट का 2023 का आदेश केवल एक ‘स्टॉप-गैप अरेंजमेंट’ (अंतरिम व्यवस्था) था जब तक कानून नहीं बन जाता। संसद कानून बनाने के लिए संप्रभु है।अनुच्छेद 324(2), अनुच्छेद 245, संसदीय संप्रभुता (Parliamentary Sovereignty)

4. अन्य वैधानिक संस्थाओं की चयन समितियों से तुलना

याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष यह दलील भी पेश की कि भारत में जब भी किसी उच्चस्तरीय नियामक या भ्रष्टाचार-रोधी एजेंसी के प्रमुख का चयन होता है, तो उसमें निष्पक्षता बनाए रखने के लिए न्यायपालिका के प्रमुख (CJI) को हमेशा शामिल किया जाता है:

  • सीबीआई निदेशक (CBI Director): प्रधानमंत्री + लोकसभा में विपक्ष के नेता + भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI)।
  • लोकपाल अध्यक्ष (Lokpal Chairperson): प्रधानमंत्री + लोकसभा स्पीकर + विपक्ष के नेता + CJI या उनके द्वारा नामित सुप्रीम कोर्ट जज।
  • केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (CVC): प्रधानमंत्री + गृह मंत्री + लोकसभा में विपक्ष के नेता।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना है कि जब एक जांच एजेंसी (CBI) के प्रमुख के चयन में CJI की मौजूदगी अनिवार्य है, तो पूरे देश का चुनावी भाग्य तय करने वाले और लोकतंत्र की धुरी कहे जाने वाले चुनाव आयोग के प्रमुख के चयन में CJI को बाहर रखना अतार्किक और दुर्भावनापूर्ण है।

5. संविधान सभा की बहस और डॉ. बी.आर. अंबेडकर की आशंकाएं

इस सुनवाई के दौरान 15 और 16 जून 1949 को संविधान सभा में हुई ऐतिहासिक बहसों का भी हवाला दिया गया। संविधान के शिल्पकार बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में अनुच्छेद 324 (तब ड्राफ्ट आर्टिकल 289) पर चर्चा करते हुए कहा था:

“चुनाव आयोग की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना नितांत आवश्यक है। यदि पूरी निर्वाचन मशीनरी को उस समय की सत्तारूढ़ सरकार के हाथों में छोड़ दिया गया, तो यह आशंका हमेशा बनी रहेगी कि सरकार अपने पसंदीदा व्यक्तियों को इन पदों पर बैठाकर चुनावों को अपने पक्ष में प्रभावित करने की कोशिश करेगी। इसलिए संसद को भविष्य में ऐसा कानून बनाना चाहिए जो कार्यपालिका के हस्तक्षेप को पूरी तरह रोके।”

6. संविधान पीठ के गठन की संभावना और भावी न्यायिक दिशा

सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान रुख से साफ है कि यह मामला केवल दो व्यक्तियों की नियुक्ति का नहीं है, बल्कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संसद की विधायी शक्ति और संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure of Constitution) के आपसी संतुलन का एक बहुत बड़ा प्रश्न है।

अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि चूंकि 2023 का अनूप बरनवाल फैसला 5 जजों की संविधान पीठ द्वारा दिया गया था, इसलिए संसद के नए कानून की वैधता की समीक्षा करने के लिए 5 या 7 वरिष्ठ जजों की एक विशेष संविधान पीठ का गठन किया जा सकता है।

7. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (Extended FAQs)

Q1: क्या सुप्रीम कोर्ट ने नए चुनाव आयुक्त कानून पर रोक (Stay) लगा दी है?
उत्तर: नहीं, अदालत ने प्रारंभिक सुनवाई में कानून के संचालन पर स्टे लगाने से इनकार किया था, लेकिन इस कानून की संवैधानिक वैधता की मेरिट पर अंतिम सुनवाई जारी रखी है।

Q2: संविधान का अनुच्छेद 324 क्या प्रावधान करता है?
उत्तर: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को संसद, राज्य विधानसभाओं, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की सर्वोच्च शक्ति सौंपता है।

Q3: वर्तमान में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) कौन हैं?
उत्तर: वर्तमान में राजीव कुमार भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) के रूप में कार्यरत हैं।

Q4: चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल कितना होता है?
उत्तर: मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों का कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु (जो भी पहले पूरी हो) तक होता है।

Q5: क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को सरकार सीधे बर्खास्त कर सकती है?
उत्तर: कदापि नहीं। संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी प्रक्रिया (संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से महाभियोग प्रस्ताव) से हटाया जा सकता है, जिस प्रक्रिया से सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।

Q6: सर्च कमेटी (Search Committee) की क्या भूमिका होती है?
उत्तर: कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय सर्च कमेटी 5 योग्य वरिष्ठ अधिकारियों का एक पैनल तैयार करती है, जिसे चयन समिति के सामने रखा जाता है।

Q7: यदि सुप्रीम कोर्ट कानून को असंवैधानिक घोषित कर दे तो क्या होगा?
उत्तर: यदि अदालत कानून को रद्द करती है, तो मार्च 2023 का अनूप बरनवाल फैसला स्वतः बहाल हो जाएगा और CJI पुनः चयन समिति का हिस्सा बन जाएंगे।

Q8: इस सुनवाई का भारतीय लोकतंत्र पर क्या असर पड़ेगा?
उत्तर: यह फैसला यह तय करेगा कि भारत में चुनावी संस्थाओं की निष्पक्षता कार्यपालिका के नियंत्रण में रहेगी या स्वतंत्र संवैधानिक संतुलन द्वारा संचालित होगी।

अंतिम निष्कर्ष: दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत की वैश्विक साख इस बात पर टिकी है कि उसके चुनाव कितने स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी हैं। सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई पर पूरे देश की निगाहें हैं, क्योंकि इसका परिणाम आने वाले दशकों तक देश की चुनावी शुचिता का मार्ग प्रशस्त करेगा।

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