चुनाव आयोग के वोटर लिस्ट रिविजन (SIR) पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई: थोक नामों के विलोपन पर विपक्षी दलों की याचिका, सीईसी ज्ञानेश कुमार से मांगा हलफनामा

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Supreme Court of India hearing bench on voter list revision and election commission

नई दिल्ली (पॉलिटिक्स व लीगल डेस्क): देश में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की पारदर्शिता, निष्पक्षता और मतदाता सूची की विश्वसनीयता को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) में एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील मामले पर गहन सुनवाई हुई। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा चलाए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान देश के कई राज्यों में लाखों मतदाताओं के नाम कथित रूप से बिना उचित सत्यापन के मतदाता सूची से हटाए जाने के खिलाफ दायर संयुक्त जनहित याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने विपक्षी दलों और नागरिक अधिकार संगठनों की चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयोग को तीन सप्ताह के भीतर एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का औपचारिक निर्देश दिया है।

क्या है पूरा विवाद? याचिकाकर्ताओं की शीर्ष अदालत में मुख्य दलीलें

यह मामला कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, राजद और आम आदमी पार्टी समेत ‘इंडिया’ (INDIA) ब्लॉक के 14 प्रमुख विपक्षी सांसदों और कई मानवाधिकार संगठनों द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने अदालत में दलील दी कि चुनाव आयोग द्वारा शुरू किए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत देश भर में बड़े पैमाने पर मतदाताओं को मृत (Dead), स्थानांतरित (Shifted) या डुप्लीकेट (Duplicate) बताकर उनके नाम मतदाता सूची से काट दिए गए हैं।

याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि आयोग के नए डिजिटल सॉफ्टवेयर और एआई-एल्गोरिदम में भारी तकनीकी खामियों की वजह से कई निर्वाचन क्षेत्रों में 50,000 से 1,00,000 तक वैध मतदाताओं के नाम बिना किसी फील्ड वेरिफिकेशन और बिना उन्हें व्यक्तिगत नोटिस दिए मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए। इनमें गरीब बस्तियों, प्रवासी मजदूरों, अल्पसंख्यकों और वंचित तबकों के मतदाताओं का अनुपात असामान्य रूप से अधिक पाया गया है। याचिका में मांग की गई कि मतदाता सूची के शुद्धिकरण के नाम पर किसी भी भारतीय नागरिक का मताधिकार नहीं छीना जाना चाहिए और सभी डिलीट किए गए नामों का स्वतंत्र फॉरेंसिक व ग्राउंड ऑडिट कराया जाए।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां: ‘मतदान का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है’

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 326 (सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार) का हवाला देते हुए बेहद महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणियां कीं। पीठ ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल एक संवैधानिक औपचारिकता नहीं हैं, बल्कि यह हमारे संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का अभिन्न अंग हैं। किसी भी लोकतांत्रिक देश में एक वैध नागरिक का नाम बिना उसकी जानकारी के मतदाता सूची से हटाया जाना अत्यंत गंभीर मामला है।

अदालत ने निर्वाचन आयोग के वकील से सवाल किया कि आयोग ने फॉर्म-7 (वोटर लिस्ट से नाम हटाने का फॉर्म) के जरिए आने वाले थोक आवेदनों (Bulk Deletions) को स्वीकार करने से पहले क्या प्रक्रिया अपनाई? क्या बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) ने घर-घर जाकर भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किया या सिर्फ डिजिटल डेटा मिलान के आधार पर नाम हटा दिए गए? अदालत ने जोर देकर कहा कि तकनीक का इस्तेमाल चुनावी प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए होना चाहिए, न कि वैध नागरिकों को वोट देने से वंचित करने के लिए।

चुनाव आयोग का अदालत में पक्ष: ‘फर्जी और डुप्लीकेट वोटों को हटाना कानूनी कर्तव्य’

दूसरी ओर, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकीलों और सॉलिसिटर जनरल ने याचिकाकर्ताओं के आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया। आयोग ने अदालत को आश्वस्त किया कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) एक नियमित, पारदर्शी और वैधानिक प्रक्रिया है जो जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के प्रावधानों के तहत की जाती है।

आयोग ने दलील दी कि देश में करोड़ों लोग बेहतर रोजगार और शिक्षा के लिए एक शहर से दूसरे शहर प्रवास करते हैं। इसके चलते एक ही व्यक्ति का नाम उसके पैतृक गांव और नए रिहायशी शहर दोनों जगह दर्ज रह जाता है, जिससे फर्जी मतदान (Bogus Voting) की संभावना बढ़ती है। आयोग ने कहा कि वह अपने नए ‘ECINet’ सॉफ्टवेयर के जरिए डुप्लीकेट और मृत व्यक्तियों के नामों की पहचान कर रहा है और किसी भी नाम को हटाने से पहले संबंधित पते पर नोटिस भेजा जाता है तथा आपत्तियां दर्ज कराने के लिए पर्याप्त समय दिया जाता है। आयोग ने यह भी बताया कि हाल ही में उसने फॉर्म-7 के थोक ऑनलाइन आवेदन पर रोक लगा दी है और अब हर आपत्ति के लिए व्यक्तिगत सत्यापन अनिवार्य कर दिया गया है।

अदालत का अंतरिम निर्देश: 3 सप्ताह में विस्तृत हलफनामा तलब

दोनों पक्षों की लंबी बहस सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई नवंबर के दूसरे सप्ताह के लिए तय कर दी। अदालत ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह अपने विस्तृत हलफनामे में निम्नलिखित चार बिंदुओं पर स्पष्ट जानकारी दे:

1. पिछले 6 महीनों के दौरान देश भर में राज्यवार कुल कितने मतदाताओं के नाम हटाए गए और कितने नए मतदाताओं के नाम जोड़े गए?
2. क्या नाम हटाने से पहले संबंधित नागरिक को व्यक्तिगत नोटिस की तामील सुनिश्चित की गई और यदि हां, तो उसका क्या प्रमाण है?
3. बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLO) द्वारा किए गए भौतिक सत्यापन की क्या प्रक्रिया रही और क्या इसकी रिपोर्ट राजनीतिक दलों के पोलिंग एजेंट्स के साथ साझा की गई?
4. जिन मतदाताओं के नाम गलती से कट गए हैं, उन्हें बिना किसी जटिल प्रक्रिया के तुरंत बहाल (Restore) करने के लिए क्या आपातकालीन हेल्पलाइन या विशेष कैंप लगाए जा रहे हैं?

आम नागरिकों के लिए जरूरी सलाह: अपनी वोटर आईडी स्टेटस तुरंत चेक करें

इस पूरे घटनाक्रम के बीच देश के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह आगामी चुनावों से पहले अपनी मतदाता सूची में नाम की पुष्टि कर ले। इसके लिए निर्वाचन आयोग के आधिकारिक पोर्टल voters.eci.gov.in पर जाएं या ‘Voter Helpline App’ डाउनलोड करें। अपना ईपीआईसी (EPIC) नंबर डालकर आप तुरंत देख सकते हैं कि आपका नाम वोटर लिस्ट में एक्टिव है या नहीं। यदि आपका नाम किसी कारणवश हट गया है, तो आप तुरंत फॉर्म-6 (नया नाम जोड़ने के लिए) या फॉर्म-8 (संशोधन के लिए) ऑनलाइन भरकर अपना नाम दोबारा जुड़वा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई भारत के चुनावी तंत्र में पारदर्शिता और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम मानी जा रही है। देश की राजनीति, संसद, न्यायपालिका और लोकतांत्रिक व्यवस्था की सभी प्रामाणिक और निष्पक्ष खबरों के लिए हमारे पॉलिटिक्स सेक्शन को नियमित रूप से पढ़ें।

Election Commission of India Nirvachan Sadan Delhi Verification
तस्वीर: नई दिल्ली स्थित निर्वाचन सदन में मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण का कार्य

मतदाता सूची शुद्धिकरण में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की सीमाएं

इस पूरे मामले ने चुनाव सुधारों में एआई और स्वचालित एल्गोरिदम के इस्तेमाल को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जहां एक ही नाम, पिता का नाम और जन्म वर्ष के हजारों नागरिक एक ही जिले में हो सकते हैं, वहां केवल कंप्यूटर प्रोग्राम के जरिए ‘डुप्लीकेट’ मानकर नाम काटना बहुत खतरनाक साबित हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी मौखिक रूप से कहा कि कोई भी एल्गोरिदम किसी इंसान के जमीनी सत्यापन का विकल्प नहीं हो सकता। जब तक बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) खुद घर जाकर दरवाजे पर दस्तक न दे और पड़ोसियों से पुष्टि न कर ले, तब तक किसी भी नागरिक का नाम मतदाता सूची से काटना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए संस्थागत संतुलन

संवैधानिक जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनाव आयोग से हलफनामा मांगना देश में ‘चेक्स एंड बैलेंसेज’ (संस्थागत संतुलन) की मजबूती को दर्शाता है। लोकतंत्र की ताकत चुनाव आयोग की स्वायत्तता में है, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि उस स्वायत्तता का प्रयोग नागरिकों के मूल अधिकारों को कमजोर करने के लिए न हो। नवंबर में होने वाली अगली सुनवाई में यह तय होगा कि क्या आयोग को पूरे देश में डिलीट किए गए नामों की सूची सार्वजनिक करनी होगी और उनके लिए विशेष सुनवाई शिविर लगाने होंगे।

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